अदालत ने आनंद तेलतुंबड़े को ज़मानत दी, अभी जेल में रहेंगे



बहरहाल हाईकोर्ट ने इस आदेश पर एक सप्ताह के लिए रोक लगा दी, ताकि इस मामले की जांच कर रही एजेंसी राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सके. इसका अर्थ है कि तेलतुंबड़े तब तक जेल से बाहर नहीं जा सकेंगे.

जस्टिस एएस गडकरी और जस्टिस एमएन जाधव की खंडपीठ ने 73 वर्षीय तेलतुंबड़े की जमानत याचिका स्वीकार कर ली. तेलतुंबड़े अप्रैल 2020 से इस मामले में जेल में हैं.

अदालत ने एक लाख रुपये के मुचलके पर उनकी जमानत मंजूर की.

एनआईए ने इस आदेश पर एक सप्ताह की रोक लगाए जाने का आग्रह किया, ताकि वह इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सके. पीठ ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया और अपने आदेश पर एक सप्ताह की रोक लगा दी.

तेलतुंबड़े इस समय नवी मुंबई की तलोजा जेल में हैं. एक विशेष एनआईए अदालत ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद उन्होंने सितंबर 2021 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, पीठ ने कहा कि तेलतुंबड़े के खिलाफ केवल धारा 38 और 39 (आतंकवादी संगठन की सदस्यता से संबंधित) के तहत अपराध बनता है.

इन अपराधों में अधिकतम सजा 10 साल के कारावास की थी और तेलतुंबड़े को पहले ही 2 साल से अधिक की जेल हो चुकी है. इसे देखते हुए अदालत ने उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया.

एनआईए की ओर से पेश अधिवक्ता संदेश पाटिल ने तर्क दिया कि कार्यक्रम में दिए गए भाषणों को कथित रूप से एक प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का समर्थन था.

उन्होंने चार्जशीट से प्रासंगिक अंश भी पेश किए और साक्ष्य को दिखाने के लिए संबंधित दस्तावेज संलग्न किया, जो एजेंसी ने घटना में उनकी कथित संलिप्तता दिखाने के लिए एकत्र किया था.

उन्होंने यह भी बताया कि तेलतुंबड़े गुप्त रूप से अपने भाई कथित माओवादी नेता मिलिंद तेलतुंबड़े के संपर्क में थे, जो इस साल की शुरुआत में गढ़चिरौली में एक मुठभेड़ में मारे गए थे.

पाटिल ने यह भी तर्क दिया कि तेलतुंबड़े कई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेंगे, जहां वे कथित तौर पर माओवादी एजेंडे को आगे बढ़ाएंगे.

तेलतुंबड़े ने अपनी याचिका में दावा किया था कि वह 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में आयोजित हुए एल्गार परिषद के कार्यक्रम में मौजूद ही नहीं थे और न ही उन्होंने कोई भड़काऊ भाषण दिया था.

अभियोजन पक्ष का कहना है कि प्रतिबंधित संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) द्वारा कथित तौर पर समर्थित इस कार्यक्रम में भड़काऊ भाषण दिए गए थे, जिसके कारण एक जनवरी 2018 को पुणे के पास भीमा-कोरेगांव गांव में हिंसा हुई थी.

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, तेलतुंबड़े ने अपनी याचिका में एनआईए अधिनियम के तहत विशेष अदालत के उस आदेश को रद्द करने की भी मांग की, जिसमें निम्नलिखित आधारों पर उनकी जमानत खारिज कर दी गई थी:

1. मामले में दाखिल की गई चार्जशीट हजारों पन्नों की है और एनआईए ने इस संबंध में 200 से अधिक गवाहों की जांच करने का इरादा किया है. इस वजह से मुकदमे को पूरा करने में सालों लग जाएंगे और इसका मतलब होगा कि सालों तक लगातार कारावास.

2. जमानत का उद्देश्य मुकदमे में अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करना है, जमानत को सजा के रूप में नहीं रोका जाना चाहिए.

याचिका में यह भी कहा गया है कि विशेष अदालत के आदेश में गलत तरीके से कहा गया है कि वह प्रतिबंधित संगठन का हिस्सा थे.

उन्होंने बताया कि किसी संगठन को ‘प्रतिबंधित’ घोषित करने का एकमात्र तरीका केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित करने या यूएपीए की अनुसूची के तहत इसे जोड़े जाना है.

तेलतुंबड़े की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मिहिर देसाई ने दलील दी कि यदि जमानत नहीं दी जाती है, तो उनके मामले में कम से कम यह किया जाना चाहिए कि उन्हें जेल के बजाय घर में नजरबंद रखा जाए.

उन्होंने बताया कि तेलतुंबड़े के खिलाफ चार्जशीट के अनुसार उनके ऊपर कोई आतंकी गतिविधि का आरोप नहीं लगाया जा सकता है, इसलिए गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत उन्हें जमानत पर रिहा करने पर कोई रोक नहीं है.

देसाई ने यह भी बताया कि एक शिक्षाविद् होने के नाते तेलतुंबड़े को अक्सर विभिन्न राष्ट्रीय और अंतररराष्ट्रीय सम्मेलनों के लिए आमंत्रित किया जाता था और उसमें भाग लेना कोई अपराध नहीं है.

तेलतुंबड़े इस मामले में जमानत पाने वाले तीसरे आरोपी हैं.

इससे पहले मामले के 16 आरोपियों में से केवल दो आरोपी वकील और अधिकार कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज और तेलुगू कवि वरवरा राव फिलहाल जमानत पर बाहर हैं. 13 अन्य अभी भी महाराष्ट्र की जेलों में बंद हैं.

आरोपियों में शामिल फादर स्टेन स्वामी की पांच जुलाई 2021 को अस्पताल में उस समय मौत हो गई थी, जब वह चिकित्सा के आधार पर जमानत का इंतजार कर रहे थे.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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