अशोक के शिलालेखो के बारे में आप क्या जानते है?

अशोक के अभिलेख मौर्य सम्राज्य के प्रमाणिक स्रोत हैं। इसमें स्तंभ शिलालेख, वृहद् शिलालेख, लघु शिलालेख और अन्य प्रकार के बड़े छोटे अभिलेख हैं। अभिलेखें के स्थानों का भौगोलिक महत्त्व हैं। अभी तक ये 45 स्थानों पर पाए गए हैं। अभिलेखों में अधिकतर प्राकृत भाषा व ब्राह्मी लिपी का प्रयोग किया गया है परन्तु पश्चिमोत्तर भाग में खरगोष्ठी व एरामाईक लिपी का भी प्रयोग किया गया है। इन अभिलेखों को महत्त्वपूर्ण यात्रा पथों पर या धार्मिक महत्त्व के स्थानों पर स्थापित किया गया है।
1837 ई. में जेम्स प्रिसेंप ने सबसे प्राचीन बाह्मी लिपी का पता लगाया। 1915 ई. में मास्की अभिलेख से अशोक की पहचान पियदस्सी से की गयी। अशोक के चैदह वृहद शिलालेख मिले हैं जो कलसी, मानसेरा, सोपारा, गिरनार, एरगिडी, धैली, जौगड़, शहबाजगढ़ी आदि स्थान पर प्राप्त होते हैं, इसी प्रकार सात स्तंभ अभिलेख प्राप्त हुए हैं जो निम्नलिखित स्थानों पर पाए गए हैं- रामपुरवा, इलाहाबाद, दिल्ली, (टोपरा) दिल्ली (मेरठ), लोंरिया अरराज, लोरिया नन्दनगढ़ आदि। कुछ अभिलेखों को अपने मूल स्थान से हटाकर किसी अन्य स्थान पर स्थापित किए गए उनमें हैः- पिफरोजशाह तुगलक के समय टोपरा और मेरठ अभिलेख को दिल्ली लाया गया। बैराट अभिलेख को कनिघम ने कलकत्ता में स्थापित कराया तथा कौशाम्बी अभिलेख को इलाहाबाद लया गया।

अशोक के शिलालेखो के बारे में आप क्या जानते है

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प्रथम शिलालेख: इस अभिलेख में पशु हत्या व समारोह पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है।

दूसरा शिलालेख: इसमें मनुष्यों व पशुओं के लिए चिकित्सा उपलब्ध करना, मार्ग निर्माण, कुंआ खोदना तथा वृक्षापोषण का उल्लेख हुआ है।

तीसरा शिलालेख: इसमें देवताओं के प्रिय राजा पियदस्सी ऐसा कहते हैं कि मेरे सम्राज्य में युक्त, रज्जुक, प्रादेशिक सभी जगहों का दौरा प्रत्येक पाँच वर्ष पर करें तथा धर्म की शिक्षा दें। माता पिता की आज्ञा मानें व सोच समझकर धन खर्च करें।

चतुर्थ शिलालेख: इसमें कहा गया है कि धर्मनीति द्वारा अनैतिकता तथा ब्राह्मण श्रमणों के प्रति निरादर की प्रवृत्ति, हिंसा और अशोभनीय व्यवहार तथा इसी प्रकार के गलत कार्यो पर नियन्त्रण लगा है। पशु हत्या पर भी रोकी जा सकी है।

पाँचवा शिलालेख: इसमें पहली बार अशोक के शासन में तेरह वर्ष में धर्ममहामात्र की नियुक्ति की चर्चा की गई है।

छठा शिलालेख: इसमें यह आदेश जारी किया गया है कि धम्ममहामात्र राजा के समक्ष किसी समय सूचनाएँ ला सकते हैं, चाहे राजा कहीं भी हों।

सातवाँ शिलालेख: इसमें सभी सम्प्रदाय के लोगों के लिए सहिष्णुता की बात की गयी और कहा गया की सब सम्प्रदाय के लोग सब जगह निवास कर सकते हैं।

आठवाँ शिलालेख: अशोक के शासन काल के दशवें वर्ष में बोघि वृक्ष की यात्रा का वर्णन है, तभी से धम्म यात्रा की प्रथा प्रारम्भ हुई।

नवाँ शिलालेख: इसमें जन, बीमारी, विवाह आदि के उनरान्त तथा यात्रा के पूर्व होने समारोहों की निन्दा की गयी है। पत्नी अथवा माता द्वारा समारोह मनाने पर प्रतिबन्ध गला दिया गया|

दशवाँ शिलालेख: इसमें प्रजा को आज्ञाकारिता से धम्म का पालन व धम्म मार्ग का अनुसरण करने की बात कही गयी है|

ग्याहरवाँ शिलालेख: इसमें धम्म नीति की व्याख्या की गई है। बड़ों का आदर, माता पिता की आज्ञा का पालन, जीवो के प्रति अहिंसा पर बल दिया गया है।

बारहवाँ शिलालेख: राजा दान और सम्मान द्वारा सभी सम्प्रदाय के लोगों का सत्कार करते हैं। इसमें स्त्राी महामात्य (इत्जिक) की चर्चा की गयी|

तेरहवाँ शिलालेख: इसमें कलिंग विजय का वर्णन की चर्चा है। युद्ध नीति के बदले धर्म नीति पर बल दिया गया है। इसमें लिखा गया गयी की यह धर्म अभिलेख इसलिए खुदवाया है कि जिससे मेरे पुत्र या प्रपौत्र नए देश जीतने की इच्छा त्याग दें और अगर नए देश भी जीतें तो संयम तथा कम दण्ड से जीतें। उन्होंने धम्म को ही असली विजय माना है।

चौदहवाँ शिलालेख: यह लेख कम महत्त्वपूर्ण हैं। इसमें कहा गया है कि लेख लिखने में लेखक द्वारा काफी अशुद्धि की गयी है।

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