इससे किशोरावस्था में उदासी और एंग्जाइटी बढ़ती है | 10 years effect of watching violent TV shows in childhood


2 घंटे पहले

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टीवी पर अपराध की दुनिया से जुड़े प्रोग्राम, हिंसा के दृश्य वाले शो और खून-खराबे वाली एक्शन फिल्मों काे पसंद करने वालों की संख्या काफी बढ़ी है। कई बार माता-पिता खुद बच्चों के साथ ऐसे शो और फिल्मों का आनंद लेते हैं। ऐसे लोगों के लिए एक अलर्ट कॉल है।

यूनिवर्सिटी ऑफ मॉन्ट्रियल का एक महत्वपूर्ण शोध बताता है कि मारधाड़ वाली फिल्में और अपराध की दुनिया से जुड़े हिंसक टीवी शो से बच्चों का बचपन ही नहीं, किशोरावस्था भी बिगड़ने का खतरा होता है। बचपन में देखे हिंसक कार्यक्रमों का असर उन पर 10 साल तक रहता है। उनकी सीखने की क्षमता घट जाती है।

छोटी उम्र में हिंसक चीजें देखना खतरनाक
जर्नल ऑफ डेवलपमेंटल एंड बिहेवियरल पीडियाट्रिक्स में छपे शोध में बताया गया कि ऐसे बच्चे, जिन्होंने साढ़े तीन साल की छोटी उम्र में हिंसक चीजें देखी हैं, वे किशोरावस्था में भावनात्मक तौर पर भी परेशान रहते हैं। शोध की प्रमुख लिंडा पगानी कहती हैं, ‘बच्चे छोटी उम्र खासकर स्कूल जाने से पहले टीवी पर जिन चरित्रों को देखते हैं, उन्हें सच मानने लगते हैं।

वे उन चरित्रों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं, जो फिल्मों या शो में किसी समस्या का समाधान हिंसा से करते हैं। फिर चाहे वह हीरो हो या विलेन। बच्चा हिंसा को सामान्य समझने लगता है। वह बड़ा होकर भी स्कूलों में फिट नहीं होता। मिडिल स्कूलिंग में वह किशोर होता है। लेकिन ऐसे किशोर जो बचपन में हिंसा को सहज मानते रहे हैं, उन पर उदासी और एंग्जाइटी हावी रहती है।’

बच्चों को समझाएं कि दुनिया डरावनी नहीं है
पगानी कहती हैं, ‘किशोरों के लिए बड़े अजीब हालात होते हैं। उन्हें पता ही नहीं होता कि वे किस चीज से जूझ रहे हैं। इसके लिए जरूरी है कि माता-पिता उनमें सामाजिक मूल्यों जैसे लोगों से कैसे मिले-जुलें, किस तरह बात करें, सामान्य शिष्टाचार सिखाएं। उनके मन से यह निकालें कि दुनिया डरावनी है।’

शोध में 3.6 से 4.6 साल के उन बच्चों को लिया गया, जिनके माता-पिता ने बताया कि उनके बच्चे हिंसक शो देखते हैं। फिर उनके व्यवहार को स्टडी तब किया, जब वे 12 साल के हो गए। शिक्षकों से फीडबैक लिया गया और बच्चों से भी बात की गई। शोध में 978 लड़कियां और 998 लड़के शामिल किए गए थे।

खुद की पसंद पर लगाम लगाएं, आप जो देखेंगे बच्चे वही देखेंगे

  • 12 साल से कम उम्र के बच्चों को पर्सनल मोबाइल देने से बचें।
  • ध्यान दें कि वे टीवी, लैपटॉप या गैजेट्स में क्या देख रहे हैं।
  • आप जिस तरह की चीजें देखेंगे, बच्चे भी उसकी नकल करेंगे।
  • बच्चों को बताएं कि हिंसक व्यवहार कतई स्वीकार्य नहीं है।

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