गुजरात सरकार ने आवारा पशुओं की शहरी इलाकों में आवाजाही रोकने वाले विधेयक को वापस लिया


विधेयक में पशुपालकों के लिए मवेशी पालने हेतु लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य किया गया था और उनके पशुओं को आवारा घूमते पाए जाने पर जेल तक की सज़ा का प्रावधान किया गया था. विधेयक पारित किए जाने के बाद से मालधारी समुदाय आंदोलन कर रहा था.

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

गांधीनगर: विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पशुपालकों के भारी विरोध के चलते गुजरात विधानसभा ने बीते बुधवार को सर्वसम्मति से उस विधेयक को वापस ले लिया, जिसमें मवेशियों की शहरी सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर आवाजाही प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव था. इस विधेयक को कई महीने पहले विधानसभा ने पारित किया था.

राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने कुछ दिन पहले ही ‘शहरी क्षेत्र में गुजरात मवेशी नियंत्रण (पालन और आवाजाही) विधेयक’ को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत राज्य सरकार को ‘इस पर पुनर्विचार और जरूरी बदलाव’ के अनुरोध के साथ लौटा दिया था, जिसके बाद इसे विधानसभा ने वापस ले लिया है.

इस विधेयक को इस साल मार्च में विधानसभा ने पारित किया था. विधेयक में पशुपालकों के लिए मवेशी पालने हेतु लाइसेंस प्राप्त करना अनिवार्य किया गया था और उनके पशुओं को आवारा घूमते पाए जाने पर जेल तक की सजा का प्रावधान किया गया था.

दो दिवसीय विधानसभा सत्र के पहले दिन बुधवार को शहरी विकास मंत्री विनोद मोरडिया ने विधेयक को वापस लेने का प्रस्ताव पेश किया, जिसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया. इस प्रस्ताव का सत्तारूढ़ भाजपा के साथ-साथ विपक्षी कांग्रेस ने भी समर्थन किया.

विधेयक वापस लेने के प्रस्ताव पर मतदान से पहले विधानसभा की अध्यक्ष नीमाबेन आचार्य ने सदन को सूचित किया कि इस विधेयक को राज्यपाल ने 17 सितंबर को संदेश के साथ लौटाया था.

न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, कांग्रेस विधायक और मालधारी समुदाय के नेता रघु देसाई ने भाजपा के फैसले को त्रुटिपूर्ण बताते हुए कहा कि गुजरात के निगम क्षेत्रों में पशु नियंत्रण के लिए पहले से ही कानून हैं. उन्होंने कहा, ‘लेकिन भाजपा विधानसभा चुनाव से पहले शहरी मतदाताओं को लुभाने के लिए बिल लेकर आई थी.’

विधेयक को वापस लेने का कदम मालधारी समुदाय के सदस्यों द्वारा बीते रविवार (18 सितंबर) को एक ‘महापंचायत’ आयोजित करने के बाद उठाया गया है, जिसमें विधेयक को रद्द करने की मांग की गई थी और 21 सितंबर को दूध की आपूर्ति बंद करने का फैसला किया गया था.

इस साल 31 मार्च को राज्य विधानसभा द्वारा विधेयक पारित किए जाने के बाद से समुदाय आंदोलन कर रहा था. आवारा पशु बिल के अलावा गुजरात हाईकोर्ट के आदेश के बाद नगर निगमों द्वारा चलाए जा रहे आवारा मवेशियों को पकड़ने के अभियान से भी समुदाय परेशान है.

कुछ महीने पहले आदिवासी समुदायों के विरोध के कारण पार-तापी-नर्मदा नदी लिंक परियोजना को वापस लेने के बाद गुजरात सरकार के लिए यह दूसरा झटका है.

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 10 महीनों में पूरे गुजरात में आवारा पशुओं द्वारा मनुष्यों पर हमले की 4,860 घटनाएं हुई हैं. इन हमलों में कम से कम 28 लोग मारे गए हैं.

बीते अगस्त माह में गुजरात के पूर्व उप-मुख्यमंत्री नितिन पटेल मेहसाणा जिले के कडी कस्बे में ‘तिरंगा यात्रा’ के दौरान एक गाय की टक्कर में घायल हो गए थे. उनके बाएं पैर की हड्डी टूट गई थी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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