जम्मू कश्मीर परिसीमन आयोग के आदेश प्रभावी हुए



परिसीमन आयोग ने जम्मू क्षेत्र में छह, जबकि कश्मीर घाटी में एक विधानसभा सीट बढ़ाई तथा राजौरी और पुंछ क्षेत्रों को अनंतनाग संसदीय सीट के तहत लाने का काम किया.

जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 के तहत गठित आयोग के आदेशों के अनुसार, केंद्र शासित प्रदेश में 90 विधानसभा क्षेत्र होंगे, जिनमें से जम्मू संभाग में 43 और कश्मीर में 47 होंगी. इनमें से नौ सीट अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित होंगी.

पूर्ववर्ती विधानसभा में 87 सीटें थीं, जिनमें से कश्मीर में 46, जम्मू में 37 और लद्दाख में चार थीं. तत्कालीन राज्य के पुनर्गठन में लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश घोषित किया गया था, हालांकि इसमें विधानसभा नहीं रखी गई थी.

कानून मंत्रालय ने एक गजट अधिसूचना में कहा कि आयोग के दो आदेशों में विभिन्न श्रेणियों के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या से संबंधित 14 मार्च का आदेश और प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के आकार से संबंधित पांच मई का आदेश शामिल है.

अधिसूचना में कहा गया है कि ये आदेश 20 मई से प्रभावी हो गए हैं.

केंद्र द्वारा सिफारिशों को स्वीकार किए जाने के साथ जम्मू और कश्मीर में पहले विधानसभा चुनाव कराने के लिए अब रास्ता साफ हो गया है.

तीन सदस्यीय परिसीमन समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई ने की. तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुशील चंद्रा (अब सेवानिवृत्त) और जम्मू कश्मीर चुनाव आयुक्त केके शर्मा इसके दो पदेन सदस्य थे.

इसके अलावा इसके आयोग में पांच सहयोगी सदस्य हैं- नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद फारूक अब्दुल्ला, मोहम्मद अकबर लोन और हसनैन मसूदी, प्रधानमंत्री कार्यालय में केंद्रीय राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह और भाजपा के जुगल किशोर शर्मा.

आयोग ने अपना दो साल का कार्यकाल समाप्त होने से ठीक एक दिन पहले पांच मई को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपी थी. आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कश्मीरी प्रवासियों या पश्चिमी पाकिस्तान के शरणार्थियों के लिए कोई सीट आरक्षित नहीं की.

परिसीमन आयोग ने अपनी 240 पृष्ठों की रिपोर्ट में कहा कि उन्हें कश्मीरी प्रवासियों की शिकायतों में दम था, लेकिन आयोग के लिए यह संभव नहीं था कि वह सरकार को उनके सदस्यों को विधायिका या संसद में नामित करने के लिए निर्देशित करे.

90 विधानसभा क्षेत्रों में से नौ अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित होंगे, जिनमें जम्मू में छह और घाटी में तीन होंगे.

राजनीतिक दलों की ओर से शुक्रवार के घटनाक्रम पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और घाटी के अन्य दलों ने पहले यह कहते हुए इसका विरोध किया था कि परिसीमन आयोग ‘अवैध’ है.

मालूम हो कि घाटी में मुख्यधारा की पार्टियों के बीच इन्हें आलोचना का सामना करना पड़ा था.

परिसीमन आयोग की सिफारिशों में जम्मू क्षेत्र को कश्मीर घाटी की तुलना में अपनी जनसंख्या के सापेक्ष अधिक सीटें मिली हैं और यह जनसंख्या मानदंड का उल्लंघन है और एक प्रमुख विवाद भी है.

2011 की जनगणना के आधार पर सीटों के निर्धारण का मतलब है कि 44 प्रतिशत आबादी वाले जम्मू को सीटों में 48 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा, जबकि 56 प्रतिशत आबादी वाले कश्मीर को सीटों में केवल 52 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा. इससे पहले कश्मीर क्षेत्र में सीटों में 55.4 फीसदी और जम्मू में सीटों में 44.5 फीसदी हिस्सेदारी थी.

रिपोर्ट के मुताबिक, फारूक अब्दुल्ला और अन्य नेशनल कॉन्फ्रेंस सांसदों ने कुछ प्रस्तावों पर आपत्ति जताई थी – विशेष रूप से कश्मीर की तुलना में जम्मू को दी गई प्राथमिकता को लेकर, इनका कहना था कि दोनों क्षेत्रों के बीच वास्तविक जनसांख्यिकीय संतुलन के साथ तालमेल नहीं है.

वहीं कश्मीर के विभिन्न राजनीतिक दलों ने परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा था कि यह घाटी में राजनीतिक रूप से लोगों को कमजोर करने का प्रयास है.

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, जम्मू क्षेत्र की जनसंख्या 53.72 लाख और कश्मीर क्षेत्र की 68.83 लाख है. कुल 90 विधानसभा क्षेत्रों में से नौ को अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित रखा गया है. इन नौ क्षेत्रों में छह जम्मू में और तीन घाटी में हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर भाजपा जम्मू क्षेत्र में 2014 के विधानसभा चुनावों की तरह शानदार प्रदर्शन करती है, तो यह केंद्रशासित प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी हो सकती है, क्योंकि घाटी के मतदाता कई दावेदारों – नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस और वाम दलों के बीच विभाजित हो जाएंगे.

इसके अलावा जम्मू क्षेत्र की नई विधानसभा सीटों को ज्यादातर हिंदू बहुल क्षेत्रों में बनाया गया है; घाटी की एकमात्र सीट सीमांत कुपवाड़ा जिले में बनाई गई है, जो सज्जाद गनी लोन के नेतृत्व वाले पीपुल्स कॉन्फ्रेंस का गढ़ है, जिसने अतीत में भाजपा के साथ गठबंधन किया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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