निचली अदालतों के जज ज़मानत देने से डरते हैं कि कहीं उन पर निशाना न साधा जाए: सीजेआई चंद्रचूड़


भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि वरिष्ठ वकीलों को अपने जूनियर साथियों के साथ ग़ुलामों जैसा बर्ताव नहीं करना चाहिए और उन्हें अच्छा वेतन देना चाहिए.

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ ने शनिवार को कहा कि निचली अदालतों में न्यायाधीश निशाना बनाए जाने के डर के चलते जमानत देने से हिचकते हैं.

एनडीटीवी के मुताबिक, बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित एक अभिनंदन समारोह में सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा, ‘जमानत देने में जमीनी स्तर (निचली अदालतों में) अनिच्छा के कारण उच्च न्यापालिका जमानत आवेदनों से भर गई हैं. निचली अदालतों में न्यायाधीश जमानत देने में अनिच्छुक नजर आते हैं, ऐसा इसलिए नहीं है कि वे अपराध समझते नहीं हैं, बल्कि उन्हें डर होता है कि जघन्य मामलों में जमानत देने पर उन्हें निशाना बनाया जाएगा.’

इस दौरान, सीजेआई ने इस पर भी जोर दिया कि वरिष्ठ वकीलों को अपने जूनियर साथियों को अच्छा वेतन देना चाहिए और उन्हें ‘गुलाम’ नहीं मानना चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘बहुत लंबे समय से हमने अपने पेशे में युवाओं को गुलामों के रूप में माना है. क्योंकि हम इसी तरह बड़े हुए हैं.’

बार एंड बेंच के मुताबिक, उन्होंने इसे दिल्ली विश्वविद्यालय में इस्तेमाल होने वाला रैगिंग का पुराना सिद्धांत करार दिया.

उन्होंने कहा, ‘यह दिल्ली विश्वविद्यालय का पुराना रैगिंग सिद्धांत है. जिनकी रैगिंग की जाती थी, वे हमेशा अपने से नीचे वालों की रैगिंग किया करते थे.’

उन्होंने आगे कहा, ‘आज के सीनियर्स यह नहीं कह सकते कि मैंने इस तरह कठिन तरीके से कानून सीखा और इसलिए मैं अपने जूनियर को वेतन नहीं दूंगा. वह समय बहुत अलग था, परिवार छोटे थे, पारिवारिक संसाधन थे और कई सारे युवा वकील जो शीर्ष पर पहुंच सकते थे, वे कभी नहीं पहुंच सके क्योंकि सामान्य सा कारण था कि उनके पास संसाधन नहीं थे.’

इस संबंध में उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि बिना पर्याप्त वेतन के बड़े शहरों में जूनियर्स के लिए जीवित रहना कितना मुश्किल है.

उन्होंने कहा, ‘कितने वरिष्ठ वकील अपने जूनियर को अच्छा वेतन देते हैं? यदि आप दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर या कोलकाता में रह रहे हैं तो एक युवा वकील को जीवित रहने में कितना खर्च आता है. इलाहाबाद जैसी जगह में भी एक युवा वकील दूसरे जिले से आता है तो उसे रहने के लिए जगह खोजनी होगी, किराया देना होगा, परिवहन और खाने का खर्च होगा. हमारे युवा वकीलों के पास चैंबर भी नहीं हैं, जहां उन्हें पैसे दिए जाते हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘इसे बदलना होगा और पेशे के वरिष्ठ सदस्य होने के नाते ऐसा करने का बोझ हम पर है.’

उन्होंने आगे कहा कि कानूनी पेशा एक ‘ओल्ड बॉयज क्लब’ है, जहां एक नेटवर्क के केवल चुनिंदा समूहों को मौके दिए जाते हैं. यह योग्यता आधारित नहीं है.

इसके साथ ही उन्होंने पेशे में भारी असमानता पर प्रकाश डाला और सुप्रीम कोर्ट के शीर्ष पायदान के वकीलों और अन्य वकीलों के बीच तुलना की. साथ ही, उन्होंने फिर से यह दोहराया कि कानूनी पेशे का ढांचा पितृसत्तावादी और जातिवादी है.

बीते दिनों एक अन्य कार्यक्रम में प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा था कि कानून के पेशे की संरचना ‘सामंती, पितृसत्तात्मक और महिलाओं को जगह नहीं देने वाली’ बनी हुई है. उन्होंने कहा था कि इसमें अधिक संख्या में महिलाओं एवं समाज के वंचित वर्गों के लोगों के प्रवेश की खातिर लोकतांत्रिक व प्रतिभा आधारित प्रक्रिया अपनाने की जरूरत है.

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