नोटबंदी का निर्णय आरबीआई के साथ काफ़ी विमर्श और अग्रिम तैयारी के साथ लिया गया था: केंद्र


मोदी सरकार के नोटबंदी के निर्णय को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है. इस बारे केंद्र सरकार ने हलफ़नामा पेश करते हुए कहा है कि नोटबंदी के बारे में उसने फरवरी 2016 में आरबीआई के साथ विचार-विमर्श शुरू किया था और उसी के परामर्श पर यह फैसला लिया गया.

नवंबर 2016 में राजस्थान में बैंक के बाहर कतार में लगे नागरिक. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि 2016 में की गई नोटबंदी एक बहुत ही सोच-विचार करके लिए गया फैसला था और यह जाली नोट, आतंकवाद के वित्तपोषण, काले धन और कर चोरी जैसी समस्याओं से निपटने की बड़ी रणनीति का हिस्सा था.

केंद्र ने नोटबंदी के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं के जवाब में दायर हलफनामे में यह बात कही है.

केंद्र ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय में अपने इस फैसले का बचाव करते हुए कहा कि 500 और 1,000 के नोटों को चलन से बाहर करने और नोटबंदी का यह निर्णय भारतीय रिजर्व बैंक के साथ गहन विचार- विमर्श के बाद लिया गया था और नोटबंदी से पहले इसकी सारी तैयारियां कर ली गई थीं.

केंद्र सरकार ने कहा, ‘नोटबंदी का निर्णय अपने आप में एक प्रभावी उपाय था और नकली धन, आतंकवाद के वित्तपोषण, काले धन व कर चोरी के खतरे से निपटने के लिए एक बड़ी रणनीति का हिस्सा भी था, लेकिन यह केवल इतने तक सीमित नहीं था. परिवर्तनकारी आर्थिक नीतिगत कदमों की श्रृंखला में यह अहम कदमों में से एक था.’

इस मामले पर पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है, जिसमें जस्टिस एसए नजीर, बीआर गवई, एएस बोपन्ना, वी. रामासुब्रमण्यम और बीवी नागरत्ना शामिल हैं. अब अगली सुनवाई 24 नवंबर को होगी।

हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा कि नोटबंदी का निर्णय रिजर्व बैंक के केंद्रीय निदेशक मंडल की विशेष अनुशंसा पर लिया गया था और आरबीआई ने इसके क्रियान्वयन के लिए योजना के मसौदे का प्रस्ताव भी दिया था.

हलफनामे में कहा गया है, ‘आरबीआई ने सिफारिश के कार्यान्वयन के लिए एक मसौदा योजना भी प्रस्तावित की थी. सिफारिश और मसौदा योजना पर केंद्र सरकार द्वारा विधिवत विचार किया गया था और उसके आधार पर, भारत के राजपत्र में अधिसूचना प्रकाशित की गई थी जिसमें घोषणा की गई थी कि निर्दिष्ट बैंक नोटों की कानूनी निविदा समाप्त की जाएगी.’

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र ने उच्चतम न्यायालय को साथ ही बताया कि उसने नोटबंदी के संबंध में फरवरी 2016 में आरबीआई के साथ विचार-विमर्श शुरू कर दिया था, नोटबंदी की अधिसूचना जारी करने से कम कम से आठ महीने पहले.

हलफनामे में कहा गया, ‘यह (फैसला) आरबीआई के साथ व्यापक परामर्श और अग्रिम तैयारी के बाद लिया गया था… तत्कालीन वित्त मंत्री ने संसद में कहा था… कि आरबीआई के साथ सरकारी परामर्श फरवरी 2016 में शुरू हुआ; हालांकि परामर्श और निर्णय लेने की प्रक्रिया को गोपनीय रखा गया.’

हलफनामे में बताया गया है कि गोपनीयता इस परामर्श और निर्णय लेने की प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण जरूरत थी. यह कहते हुए कि लोगों को होने वाली कठिनाइयों को कम करने के लिए व्यापक उपाय किए गए थे, केंद्र ने कहा कि उसने निर्दिष्ट बैंक नोटों को कुछ लेन-देन जैसे कि बस, ट्रेन और हवाई टिकट बुक करने, सरकारी अस्पताल में उपचार और एलपीजी सिलेंडर की खरीद के लिए छूट प्रदान की थी.

सरकार ने कहा, ‘नकली मुद्रा, काले धन और आतंकी गतिविधियों के वित्तपोषण, औपचारिक क्षेत्र का विस्तार, लेन-देन का डिजिटलीकरण, अंतिम कोने तक पहुंच को सक्षम करने के लिए संचार कनेक्टिविटी का विस्तार, कर आधार को व्यापक बनाना, कर अनुपालन को बढ़ाना… सरकार के आर्थिक नीति संबंधी एजेंडे में प्रमुख थे.’

हलफनामे में व्यवसाय की लागत को कम करने, वित्तीय समावेशन को सुगम बनाने और अनौपचारिक क्षेत्र में दीर्घकालिक विकृतियों को दूर करने का भी उल्लेख किया गया है.

बता दें कि बीते 9 नवंबर को अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने व्यापक हलफनामा तैयार नहीं कर पाने के लिए पीठ से माफी मांगी थी और एक सप्ताह का समय मांगा था.

जस्टिस नागरत्ना ने तब कहा था कि आम तौर पर संविधान पीठ इस तरह नहीं उठती और यह बहुत शर्मनाक है. अंतत: शीर्ष अदालत ने सरकार को हलफनामा पेश करने के लिए एक सप्ताह का समय दे दिया था.

पीठ केंद्र के 8 नवंबर 2016 के नोटबंदी करने के फैसले को चुनौती देने वाली 58 याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है.

गौरतलब है कि 16 दिसंबर 2016 को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार के फैसले की वैधता और अन्य संबंधित विषयों को आधिकारिक निर्णय के लिए पांच न्यायाधीशों की बड़ी पीठ को भेजा था.

सरकार के फैसले का विरोध करने वाले याचिकाकर्ताओं का कहना रहा है कि इसमें संवैधानिक महत्व के मुद्दे शामिल हैं. उन्होंने तर्क दिया है यह सवाल अभी भी काफी हद तक जिंदा है कि क्या सरकार एक विशेष वर्ग की पूरी मुद्रा को विमुद्रीकृत करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 को लागू कर सकती है और अगर इसका जवाब नहीं दिया जाता है तो सरकार इसे भविष्य में भी दोहरा सकती है.

वहीं, कोर्ट पहले कह चुका है कि वह अपनाई गई प्रक्रिया और उस तरीके की जांच करेगा जिससे नोटबंदी लागू की गई थी.

12 अक्टूबर को पीठ ने कहा था, ‘सरकार की समझदारी मामले का एक पहलू है, और हम जानते हैं कि लक्ष्मण रेखा कहां है. लेकिन जिस तरीके से इसे किया गया है और जो प्रक्रिया अपनाई गई है, उसे जांचा जा सकता है. इसके लिए हमें सुनवाई करने की जरूरत है…’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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