पॉक्सो केस के निपटारे में लगते हैं क़रीब डेढ़ साल, यूपी में लंबित मामलों का प्रतिशत सर्वाधिक: रिपोर्ट


यौन अपराधों से बच्चों को संरक्षण क़ानून के दस साल पूरे होने पर विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में पॉक्सो के लंबित मामलों का प्रतिशत सर्वाधिक था, जहां नवंबर 2012 से फरवरी 2021 के बीच दर्ज कुल मामलों में से तीन-चौथाई (77.7%) से अधिक लंबित हैं.

(इलस्ट्रेशनः द वायर)

नई दिल्ली: यौन अपराधों से बच्चों को संरक्षण कानून (पॉक्सो) के दस साल पूरे होने पर विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, इस अधिनियम के तहत दर्ज मामले को निपटाने में औसतन एक साल और पांच महीने लगते हैं और उत्तर प्रदेश ऐसा राज्य है जहां इसके लंबित मामलों का प्रतिशत सबसे अधिक है.

यह रिपोर्ट विधि के जस्टिस, एक्सेस एंड लोअरिंग डिलेज़ इन इंडिया (JALDI) पहल और वर्ल्ड बैंक स्टडीज़ के डेटा एविडेंस फॉर जस्टिस रिफॉर्म (DE JURE) प्रोग्राम, का नतीजा है, जिसमें पॉक्सो के मामलों के चलन और इसके अमल में अदालतों के प्रभाव का अध्ययन  किया गया है.

इसमें लगभग 4,00,000 पॉक्सो मामलों को देखा गया और केस लंबित रहने और निपटान के पैटर्न को समझने के लिए उनमें से 230,730 का विश्लेषण किया गया है.

रिपोर्ट कहती है, हालांकि, पॉक्सो के लंबित मामले बीते कुछ सालों में धीरे-धीरे बढ़े ही हैं, लेकिन 2019 और 2020 के बीच लंबित मामलों की संख्या में 24,863 की तीव्र वृद्धि देखी गई, जिसके लिए कोविड महामारी को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.

रिपोर्ट में पाया गया है कि उत्तर प्रदेश में पॉक्सो के लंबित मामलों का प्रतिशत सर्वाधिक था, जहां नवंबर 2012 से फरवरी 2021 के बीच दर्ज किए गए कुल मामलों में से तीन-चौथाई (77.77%) से अधिक लंबित हैं.

लंबित मामलों में अधिकतम प्रतिशत वाले पांच जिलों में से चार उत्तर प्रदेश (लखनऊ, हरदोई, बदायूं और इलाहाबाद) के हैं और एक पश्चिम बंगाल (हावड़ा) का.

इस समय उच्चतम निपटान प्रतिशत वाला राज्य तमिलनाडु है, जहां यह दर 80.2% है.

मुकदमों के निस्तारण में लगने वाला समय

रिपोर्ट में पाया गया है कि पॉक्सो अधिनियम की धारा 35 द्वारा निर्धारित एक वर्ष की समय अवधि के मुकाबले पॉक्सो मामले को निपटाने में औसतन 509.78 दिन (एक वर्ष और 5 महीने) लगते हैं.

चंडीगढ़ और पश्चिम बंगाल ही ऐसे राज्य हैं जहां दोषसिद्धि के लिए औसत समय एक वर्ष की अवधि के भीतर है.

रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि ज्यादातर राज्यों में अदालतें उन मामलों की तुलना में जिनमें अंत में दोषमुक्ति होती है, की अपेक्षा उन मामलों की सुनवाई में अधिक समय देती हैं जिनमें अंतत: दोषसिद्धि हुई है.

पॉक्सो मामले में हर एक दोषसिद्धि के लिए पर तीन दोषमुक्ति होती है. रिपोर्ट में अध्ययन किए गए सभी राज्यों में दोषसिद्धि की तुलना में बरी होने का आंकड़ा काफी अधिक है.

उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश में दोषसिद्धि की तुलना में दोषमुक्ति सात गुना अधिक है; और पश्चिम बंगाल में दोषसिद्धि की तुलना में दोषमुक्ति पांच गुना अधिक है. केरल एकमात्र ऐसा राज्य है जहां दोषमुक्ति और दोषसिद्धि के बीच का अंतर बहुत अधिक नहीं है, यहां निपटान किए गए कुल मामलों में से दोषमुक्ति 20.5% है और दोषसिद्धि 16.49%.

रिपोर्ट यह भी कहती है कि साक्ष्य के चरण में, जहां अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष दोनों उनके मामले का समर्थन करने के लिए अदालत के सामने साक्ष्य पेश करते हैं में- प्रारंभिक सुनवाई, आरोप तय करने, साक्ष्य और जिरह सहित सभी चरणों में सबसे अधिक समय लगता है.

इंडियन एक्सप्रेस ने इस अध्ययन पर अपनी रिपोर्ट में बताया है कि साक्ष्य प्रस्तुत करने की इतनी लंबी अवधि के बावजूद 43.44% मुकदमों का अंत दोषमुक्ति होता है, केवल 14.03% में दोष सिद्ध होते हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि पॉक्सो के सभी मामलों में से 56% से अधिक पेनिट्रेटिव यौन हमले (31.18%) और गंभीर पेनिट्रेटिव यौन हमले (25.59%) के अपराधों से संबंधित हैं, जिनके लिए इस अधिनियम के तहत सबसे कठोर दंड का प्रावधान है.

रिपोर्ट में जो सिफारिशें की गई हैं उनमें पर्याप्त सुरक्षा उपायों के साथ सहमति की उम्र को 18 से घटाकर 16 करना भी है. हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने पॉक्सो के तहत आरोपों में गिरफ्तार एक व्यक्ति को जमानत देते हुए कहा था कि अधिनियम के पीछे का उद्देश्य बच्चों के खिलाफ यौन शोषण को रोकना था और युवा वयस्कों के सहमति के संबंधों को अपराध बनाना नहीं.

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