वो दोषी नहीं हैं, लेकिन निरपराध ही सज़ा भुगत रहे हैं


विशेष रिपोर्ट: जेल में सज़ा काट रही महिला क़ैदियों के साथ रहने वाले बच्चों को तो तमाम परेशानियों का सामना करना ही पड़ता है, लेकिन वो जिन्हें मां से अलग कर बाहर अपने बलबूते जीने के लिए छोड़ दिया जाता है, उनके लिए भी परेशानियों का अंत नहीं होता.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

यह आलेख ‘बार्ड‘ द प्रिजन प्रोजेक्ट’ सीरीज के हिस्से के तौर पर पुलित्जर सेंटर ऑन क्राइसिस रिपोर्टिंग के साथ भागीदारी में प्रस्तुत किया गया है. 

मुंबई: पुलिस का एक बड़ा तलाशी दल जब रागिनी बाई की खोज करती हुई आई, उस समय वह एक निर्माण स्थल (कंस्ट्रक्शन साइट) पर थीं. उनके पति की निर्मम तरीके से हत्या की गई थी और शव एक जूट के बोरे में बंधा हुआ कई फीट ऊंचे निर्माण मलबे के भीतर पाया गया था.

पुलिस को शक था कि रागिनी बाई, एक अन्य पुरुष के साथ (पुलिस ने जिसे रागिनी का प्रेमी होने का दावा किया) इस हत्या में शामिल थीं. रागिनी बाई ने इन आरोपों का पुरजोर विरोध किया था. लेकिन उस समय उनकी मुख्य चिंता का कारण न पति की हुई हत्या था, न ही इस हत्या में शामिल होने को लेकर पुलिस का उन पर शक था. उस समय उन्हें अपने पांच साल के बेटे, जो मुंबई के बाहरी इलाके में स्थित तलोजा के निर्माण स्थल पर साये की तरह उनके साथ रहता था, की सलामती की चिंता ही खाए जा रही थी.

ओडिशा के सबसे पिछड़े जिलों में से एक कालाहांडी की दलित भूमिहीन मजदूर रागिनी को यह डर था कि पुलिस उनके बच्चे को लेकर चली जाएगी और वह फिर कभी उसे नहीं देख पाएगी. कुछ सूझ न पड़ते हुए रागिनी ने अपने बच्चे को एक महिला, जिसके बारे में उसका दावा था कि वह उसकी बहन है, को सौंप देने का आग्रह किया. कानूनी तौर पर पुलिस पर इस दावे का सत्यापन करने की जिम्मेदारी थी, जिसे निभाना जरूरी नहीं समझा गया.

रागिनी बाई को 25 नवंबर, 2019 को गिरफ्तार किया गया था. उस समय वह गर्भवती थीं. उन्होंने मुंबई शहर से 50 किलोमीटर दूर कल्याण की ठसाठस भरी जिला जेल में एक बेटी को जन्म दिया. गिरफ्तारी के समय उनकी सबसे बड़ी बेटी ओडिशा में उसकी मां के घर में थी. अभिभावकों की तरफ से कोई सहारा नहीं मिलने और खस्ता माली हालत के चलते उसकी बेटी को स्कूल से निकलना पड़ा और अब वह अपने गांव से कई किलोमीटर दूर एक धान के खेत में बाल मजदूर के तौर पर काम करने पर मजबूर है

रागिनी बाई ने जो सोचा था, उसके उलट उन्हें इस साल मई तक अपने छोटे बेटे के पते-ठिकाने के बारे में कुछ भी मालूम नहीं था. जिस महिला को वह अपने बेटे का अनौपचारिक संरक्षण (कस्टडी) सौंप आई थी, उसका फोन नंबर उनकी गिरफ्तारी के बाद से ‘आउट ऑफ सर्विस’ आ रहा था.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

मई के मध्य में कोई और रास्ता नहीं होने पर टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के फील्ड एक्शन प्रोजेक्ट प्रयास  से संबंधित पारा लीगल और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह ने मामले को अपने हाथ में लेने का फैसला किया. दो सामाजिक कार्यकर्ताओं- रीना जैसवार और विद्या तोराने- ने खोज अभियान (सर्च ऑपरेशन) की योजना बनाई. लेकिन उन्होंने इसके बारे में पुलिस को सूचित नहीं किया.

प्रयास से जुड़ी वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता रीना जैसवार पूछती हैं, ‘क्या उनसे कभी कोई मदद मिली है?’ रागिनी बाई ने उन्हें एक चलताऊ पता दिया था. उसने कहा था, ‘मैं तलोजा में एक हाईवे के नजदीक एक कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करती थी. वहां हाईवे के किनारे एक ऊंचा स्कूल था.’

जैसवार याद करते हुए कहती हैं, ‘हमने पूरे हाईवे पर तलाश किया और सड़क के किनारे के स्कूल का पता लगाने की कोशिश की. कई घंटे तक खोजने के बाद और मजदूरों और स्थानीय दुकानदारों से पूछताछ करने के बाद हम एक महिला तक पहुंचे.’

तोराने ने बताया, वह महिला रागिनी बाई की बहन निकली. ‘एक साधारण से तथ्य की पुष्टि करने में तीन साल का समय लग गया. तीन साल की देरी का मतलब था कि रागिनी बाई का बेटा कभी स्कूल गया ही नहीं. वह अब आठ साल का है.

रागिनी बाई अभी तक अपने बच्चे को नहीं देख पाई है. उसकी बहन इस डर से कि हम बच्चे को उससे छीन लेंगे, अगले ही दिन (जैसवार जिस दिन उससे मिलीं) कालाहांडी चली गई. जैसवार ने बताया, ‘हमने उस बच्चे को जल्द से जल्द मुंबई लाने के लिए कालाहांडी जिले में अपने एनजीओ संपर्कों को भी सक्रिय कर दिया है, ताकि रागिनी बाई अपने बच्चे से मिल सके.’

मुंबई के चिल्ड्रेन वेलफेयर कमेटी (सीडल्ब्यूसी) के पूर्व अध्यक्ष विजय दोईफोड़े का कहना है कि रागिनी बाई का मामला चिंताजनक है, लेकिन यह अपने आप में अकेला या असाधारण मामला नहीं है.

दोईफोड़े ने कहा, ‘महिलाएं अपनी गिरफ्तारी के समय अपने बच्चों को किसी भी तरीके से पुलिस या सरकार के नियंत्रण में देने से रोकने की हरसंभव कोशिश करती हैं. वे स्वाभाविक तौर पर अपने बच्चों को सरकार संचालित संस्थानों की देखरेख में देने की जगह उन्हें अपनी पहचान के व्यक्ति को सौंपना ज्यादा पसंद करती हैं.’

जेलों का नियमित दौरा करने और वहां कैद महिलाओं से संवाद करनेवाले दोईफोड़े के मुताबिक, ‘ये सब ‘सुरक्षात्मक झूठ हैं’ जो महिलाएं अपने बच्चों के लिए बोलती हैं. इसलिए पुलिस के लिए यह और भी जरूरी हो जाता है कि वह गिरफ्तारी के समय महिलाओं द्वारा किए गए दावों की गहराई से जांच करें और सीडब्ल्यूसी और कोर्ट, दोनों को ही इस संबंध में सूचित करें.’

बच्चे का गुम हो जाना या जेल में रहते हुए अपने बच्चे का अभिभावकत्व खो देना आपराधिक न्याय प्रणाली के चंगुल में फंसी औरतों का सबसे सामान्य यथार्थ है.

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दोईफोड़े कहते हैं, ‘यह इतना आम है कि इसे ‘सजा के हिस्से’ के तौर पर स्वीकार किया जाने लगा है.’ उन्होंने आगे कहा, ‘हम जब भी बायकुला जेल जाते हैं, वहां हमें जेल से बाहर अपने बच्चों की खैरियत जानने के लिए बड़ी उत्सुकता से हमारी मदद की गुहार लगाने वाली 4-5 औरतें मिल जाती हैं. महिला कैदियों से मैंने यह आम शिकायत सुनी है कि गिरफ्तारी के बाद से उन्हें उनके बच्चों का कोई अता-पता नहीं है.’

दोईफोड़े का कहना है कि अगर पुलिस और जेल अधिकारी अपना काम ज्यादा मुस्तैदी से करें तो यह स्थिति पैदा नहीं होगी.

एक चरमराई हुई व्यवस्था और जवाबदेही की कमी आपराधिक न्याय प्रणाली के शिकंजे में फंसी महिलाओं के बच्चों के जीवन पर नुकसानदेह प्रभाव डाल सकती हैं. मार्च, 2020 में भारत में कोविड-19 महामारी फैलने और देशव्यापी लॉकडाउन लगाए जाने के कारण ये समस्याएं और भी ज्यादा विकराल हो गईं. इसने सबसे अधिक हाशिये पर रहनेवाले लोगों के लिए कल्याणकारी सहायता तंत्र को बुरी तरह से दरका दिया.

बाहर की दुनिया में हालात धीरे-धीरे सामान्य होते गए, लेकिन जेल के भीतर लॉकडाउन के बुरे प्रभाव अब भी कायम हैं. परिवार वालों से मुलाकात, मेडिकल चेक अप, अदालत में रूटीन हाजिरी- जो कैदियों के लिए जेल से बाहर की दुनिया में सांस लेने के कुछ मौके होते हैं- आदि को अचानक रोक दिया गया.

दोईफोड़े कहते हैं, ‘दो साल के बाद भी हालात में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आए हैं. आपको कम से कम एक दर्जन औरतें अपने बेटे या बेटी की खोज-खबर लेने के लिए उनसे एक मुलाकात तय कराने के लिए चिरौरी करती हुई मिल जाएंगी.’

यरवदा सेंट्रल जेल में पार्वतीबाई ने बताया कि उनका बच्चा उन्हें पहचान सके, इसके लिए उन्हें कितनी मुश्किलें सहनी पड़ीं. 2011 में उनकी गिरफ्तारी के समय उनकी बेटी महज 3 महीने की थी. नांदेड़ की रहने वाली आदिवासी पार्वतीबाई को कई दफे एक जेल से दूसरे जेल में स्थानांतरित किया गया था, जिससे अपने बच्चे से मिल पाना उनके लिए असंभव हो गया, जो उस समय सांस्थानिक आश्रय में रह रहा था.

पार्वतीबाई ने बताया, ‘2020 में जब आखिरकार कोविड-19 महामारी के चलते पैरोल पर छोड़ा गया, और मेरी बेटी को भी घर भेजा गया, तब मैं उससे मिल सकी. मैं उसकी मां हूं, मेरी बेटी को यह जानने में नौ साल लग गए.’

निश्चित तौर पर जेलें बच्चों की परवरिश की जगह नहीं है. लेकिन अभिभावकीय देखभाल के अभाव में छह साल से कम उम्र के बच्चों को जेलों में अपनी मांओं के साथ रहना पड़ता है. सुप्रीम कोर्ट ने 2006 के आरडी उपाध्याय बनाम आंध्र प्रदेश राज्य वाले मामले में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदशों को बच्चों के छह साल के होने तक उनकी मांओं के साथ रहने देने का निर्देश दिया था.

कोर्ट का तर्क था कि इतनी कम उम्र के बच्चे को उसकी मां से अलग करने के विध्वंसकारी प्रभाव हो सकते हैं. लेकिन बच्चे के छह साल पूरा होने पर बच्चे को योग्य पालक को सौंप दिया जाना चाहिए या किसी घर में सुरक्षात्मक संरक्षण (कस्टडी) में हस्तांतरित कर दिया जाना चाहिए और हफ्ते में कम से कम एक बार उसे अपनी मां से मिलाने के लिए लाया जाना चाहिए.

सिर्फ बच्चे के शारीरिक उम्र के आधार पर तय किया गया यह अलगाव, जिसमें बच्चे की मानसिक अवस्था की ओर ध्यान नहीं दिया गया है,  का परिणाम बच्चे और मां दोनों को गहरा संताप देने वाला रहा है.

2018 के जून में जब सना छह साल की हो गई, वह काफी उत्साहित थी. वादे के अनुसार, जेलर काका ने उसे एक पीली गुड़िया खरीदकर दी और जेल मौसियों (जैसा कि वह जेल की महिला कैदियों को संबोधित किया करती थी) ने उसके लिए उसके पसंद की खीर बनाई.

उसकी मां आएशा, जो यूं तो काफी खुशमिजाज हैं, इस सारे जश्न से दूर रहीं. अकोला जिला जेल में विचाराधीन कैदी के तौर पर अपने चार साल के प्रवास में उसने कई बच्चों को छह साल का होता हुआ और उसे शहर के दूरस्थ हिस्से में सांस्थानिक देखरेख में भेजा जाते हुए देखा था. सना के जन्मदिन की पार्टी के छह दिन के बाद उसे भी दूर भेज दिया गया.

आएशा को जल्दी ही एक हत्या की कोशिश के मामले में दोषसिद्ध करार दिया गया और 10 साल के सश्रम कैद में भेज दिया गया. दोषसिद्धि के बाद उन्हें 250 किलोमीटर दूर औरंगाबाद सेंट्रल जेल में स्थानांतरित कर दिया गया. लेकिन सना अकोला के सांस्थानिक देखरेख में ही रखी गई. कोविड-19 महामारी शुरू होने के बाद से दोनों को मिलने का मौका नहीं मिला है. आएशा के कारावास की सजा पूरी होने में दो साल बचे हुए हैं.

ऑन विमेन इनसाइड  में सामाजिक इतिहासकार और जेल सुधार पर शोध करने वाली रानी धवन शंकरदास महिला कैदियों के छोटे बच्चों के साथ किस तरह से व्यवहार किया जाए, इसको लेकर दुविधा पर चर्चा करती हैं.

महिला कैदियों पर उनके दशकों के काम के दौरान उनके सामने एक मामला आया, जिसके बारे में उन्होंने अपनी किताब में विस्तार से लिखा है- दहेज हत्या के एक मामले में जेल में बंद परिवार की तीन पीढ़ियों की महिलाओं के बारे में. जबकि एक बूढ़ी महिला और उसकी दो बेटियों को एक मामले में दोषी करार दिया गया था, दो बेटियों में से एक के दो छोटे बच्चे थे, जिन्हें जेल में साथ ले आया गया था, ताकि वे अपनी मां के साथ रह सकें.

परिवार के साथ अपनी बातचीत के दौरान, खासतौर पर दोनों बहनों में छोटी बहन के साथ बातचीत के क्रम में शंकरदास को यह एहसास हुआ कि वास्तव में वह (छोटी बेटी) एक नाबालिग थी- और शायद एक वयस्क के तौर पर जेल में बंद किए जाने के दौरान वह सिर्फ 14 साल की ही थी.

जब शंकरदास ने यह मामला लड़की की मां के सामने उठाया, तो मां गुस्से में आ गई और उसने यह स्पष्ट कर दिया कि वास्तव में उसे यह मालूम था कि उसकी बेटी नाबालिग है- लेकिन वह अपनी किशोर बेटी को किसी और जगह कैसे छोड़ सकती थी, जबकि वह खुद जेल में बंद थी. शंकरदास और उनकी टीम की कोशिशों के बाद उस लड़की को आखिरकार रिहा कर दिया गया.

शंकरदास बताती हैं, ‘इस मामले में परिवार और आपराधिक न्याय प्रणाली ने मिलकर ‘सुविधाजनक समाधान’ निकालने का काम किया. वह लड़की उसकी उम्र को देखते हुए साथ बच्ची की तरह उसके साथ नहीं रह सकती थी, इसलिए उसे दोषसिद्ध वयस्क दिखाया गया ताकि उसे बिना देखरेख के छोड़ देने की समस्या से बचा जा सके.’

उन्होंने आगे बताया, ‘आश्रयगृहों को लेकर मौजूद संदेहों और वहां जवान लड़कियों के साथ किए जाने वाले व्यवहार के चलते परिवार को सबसे अच्छा रास्ता यही लगा. सरकारी तंत्र भी इस खेल में शामिल हो गया. लेकिन जेल में रहने के दौरान वह किशोर लड़की बेचैन और चिड़चिड़ी रहा करती थी और यह समझ पाने में नाकाम थी कि आखिर उसके साथ क्या हो रहा है- और जेल के पास उसकी मानसिक चिंता के समाधान का कोई तरीका नहीं था.’

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

उपाध्याय वाला फैसला- जो संयुक्त राष्ट्र के महिला कैदियों के साथ व्यवहार के नियमों (बैंकॉक रूल्स) और कैदियों के साथ व्यवहार के संयुक्त राष्ट्र न्यूनतम मानक (मंडेला रूल्स) जैसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है- जेल में एक बच्चे की सेहत, शिक्षा और समग्र शारीरिक और मानसिक विकास जैसे 15 अहम पहलुओं को रेखांकित करता है. लेकिन जमीनी स्तर पर इन नियमों को शायद ही लागू किया जा रहा है.

एक पूर्व कैदी सुजाता, जो अपनी राजनीतिक विचारधारा के चलते छह साल जेल में बंद थीं, महाराष्ट्र में विभिन्न जेलों में बंद किए जाने के दौरान के अनुभवों और पर्यवेक्षणों को साझा करती हैं.

वह कहती हैं, ‘जेल सबसे ज्यादा बच्चों को तोड़ देती है.’ नागपुर केंद्रीय जेल और गोंदिया जिला जेल में ले जाए जाने से पहले सुजाता ने बायकुला महिला जेल (महाराष्ट्र की एकमात्र ‘महिला जेल’) में कई साल बिताए.

सुजाता याद करती हैं, ‘कुछ साल पहले बायकुला जेल में एक तीन साल का बच्चा अपनी मां के साथ आया. वह काफी मशहूर बच्चा था. वह पूरे दिन खेलता, शोर करता और उधम मचाता था. जेल के कुछ फिल्मों के शौकीन लोग उस छोटे बच्चे को प्यार से ‘सन्नी देओल’ पुकारते थे.’

सुजाता बताती है, ‘आम तौर पर खुश रहने वाला यह बच्चा शाम होने पर एक बिल्कुल ही अलग ही व्यक्तित्व में बदल जाता. पांच बजे शाम, यानी बंदी (या ताला लगाने के समय) हर कैदी को अपनी कोठरी में लौटना होता था. महिलाओं को इस नियम के बारे में पता था और उन्होंने इसे कबूल कर लिया था, लेकिन इस छोटे से बच्चे के लिए बाकी समय लोहे में पिंजरे में बिताना स्वीकार करना आसान नहीं था.’

सुजाता याद करती हैं, ‘जिस समय जेलकर्मी हमारी तरफ आते हमें अपनी कोठरियों में जाने के लिए कहते हुए आते दिखाई देते, उसी समय से वह छोटा बच्चा बेतहाशा चिल्लाने लगता. वह बच्चा पूरी तरह से डरा हुआ लगता और उसकी मां के लिए उसे संभालना नामुमकिन था.’

सुजाता कहती है कि अगले 13 घंटे तक (अगले दिन सूर्योदय के समय कोठरियों के खुलने तक) बंद रहकर बिताने की कल्पना उसे इस कदर डराती थी कि वह लोहे की सलाखों को पकड़कर अपने शरीर को उनके बीच से निकालने की कोशिश करता था. हर दिन उसे इस तकलीफ से गुजरते देखना बहुत कष्टदायक था. उस छोटे बच्चे ने मां को जमानत पर रिहा होने तक 18 महीने जेल में बिताए.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

देश में अपराध और जेलों के आंकड़े तैयार करने वाली एकमात्र सरकारी एजेंसी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) का कहना है कि करीब 1,700-1,800 बच्चे अपनी मांओं के साथ जेल में आते हैं.

2020 के लिए प्रकाशित एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक भारत की 1,306 जेलों में 20,046 महिलाएं- जिनमें ट्रांसजेंडर महिलाएं भी शामिल हैं- कैद हैं. 31 दिसंबर, 2020 तक, ‘1,427 महिला कैदी 1,628 बच्चों के साथ जेल में हैं.’ इसका मतलब है कि जेल में लालन-पालन करने के लिए कुछ महिला कैदियों के पास एक से ज्यादा बच्चे हैं.’

जेल में बंद कुल कैदियों में महिलाओं का प्रतिशत 4 प्रतिशत से कम है, ऐसे में कई राज्यों में समर्पित महिला जेल भी नहीं हैं. देश के कुल 13,06 जेलों में, महिलाओं की सिर्फ 29 जेलें हैं. ये जेलें 14 राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में अवस्थित हैं. बाकी के 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में महिलाओं को रखने के लिए एक भी समर्पित जेल नहीं है.

उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य, जिसमें हर साल बड़ी संख्या में लोग जेलों में बंद रहते हैं, महिलाओं को समर्पित सिर्फ एक जेल है. यहां यह दर्ज करना उपयोगी होगा कि जेल में बंद महिलाओं में 75 फीसदी विभिन्न धर्मों से आनेवाले अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्गों से आती हैं.

इस तरह से देखें, तो सबसे ज्यादा हाशिये से आने वाली महिलाएं सरकारी तंत्र के सबसे बुरे व्यवहार का सामना करती हैं.

द वायर  की जाह्नवी सेन ने भारतीय जेलों में महिलाओं पर ‘बार्ड- द प्रिजंस प्रोजेक्ट’ सीरीज के तहत अपनी रिपोर्ट में जेलों में महिलाओं के लिए जगह की कमी पर विस्तार से बताया है.

वे लिखती हैं कि हालांकि, जेल में महिलाओं की समग्र निवास दर पुरुषों की तुलना में काफी कम है, फिर भी देश की ज्यादातर महिला जेलें क्षमता से ज्यादा भरी हुई हैं. पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ऑक्यूपेंसी दर 130 फीसदी से भी ज्यादा है. और जब इन्हीं ठसाठस भरी जेलों में बच्चों को भी रहना पड़ता है, तो स्थिति और भी ज्यादा खराब हो जाती है. बच्चों और उनकी मांओं के लिए कोई अलग जगह निर्धारित नहीं है. उन्हें जो जगह उपलब्ध है, उसी में काम चलाना पड़ता है.

राज्य के प्रिजन मैन्युअल (जेल संहिता) के हिसाब से देखें तो ज्यादातर जेलों में बच्चे और गर्भवती महिलाएं विशेष खुराक पाने के हकदार हैं. लेकिन यह अधिकार सिर्फ कागज पर ही सीमित है.

सुजाता कहती हैं, ‘साथ ही यह कल्पना कीजिए कि एक बढ़ते बच्चे को यह कहा जाए कि उसे सिर्फ 150 मिली लीटर दूध ही मिलेगा, क्योंकि नियमावली में इतनी की ही इजाजत है. या सिर्फ एक मुट्ठीभर पकाया हुआ मुरमुरा ही खाने को मिलेगा, क्योंकि जेल अधीक्षक इससे ज्यादा की इजाजत नहीं देंगे.’

ज्यादातर महिला कैदियों- परित्यक्त और जेब से खाली-  को उनके परिवार की तरफ से कोई मनीऑर्डर नहीं भेजा जाता. पैसे की कमी का मतलब है कि वे जेल की कैंटीनों में बिकने वाला खाना नहीं खरीद सकती हैं. सुजाता कहती हैं कि जेल में बिताए गए अपने छह सालों में उन्होंने बच्चों की एक बहुत बड़ी संख्या देखी है, जिन्हें खाने के मामले में समझौता करने या अच्छा खाना खाने की इच्छा छोड़ देने के लिए कहा जाता है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

द वायर  ने जेल में बंद जिन मांओं से बात की, उनमें से ज्यादातर ने कहा कि जेल में रहते हुए बच्चों के पास खेलकूद या मनोरंजन की कोई सुविधा नहीं होती है.

पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में छह महीने के करीब बिताने वाली विचाराधीन कैदी सोनू ने बताया कि ‘अगर मिलने आनेवाले पारिवारिक सदस्य या कोई एनजीओ जेल में बच्चों को कोई गुड़िया या कार दिला देता है, तो जेलकर्मियों द्वारा उसे जब्त कर लिया जाता है. सभी जेलों में बच्चों को सिर्फ बंदी या कैदी वाला खेल खेलते ही देखा जाता है.

सोनू ने कहा, ‘वे जो दिन भर देखते हैं, बस उसकी नकल करते हैं. इस खेल में गिरफ्तारी और हिंसा से लेकर रिहाई तक सारी चीजें शामिल हैं.’ उन्होंने यह भी बताया कि हालांकि वे और उनका बच्चा अब बाहर आ गए हैं, लेकिन बंदी खेल अब भी जारी है.

शारीरिक तलाशी- जिसमें पैट डाउन सर्च, स्ट्रिप सर्च और कैविटी चेक्स शामिल हैं- जेलों में किए जाने वाले सामान्य अभ्यास हैं. जेल में आनेवाले और जेल से बाहर जाने वाले कैदी की गहन जांच की जाती है और कई महिला कैदियों का कहना है कि जेल अधिकारी छोटे बच्चों को भी इससे छूट नहीं देते हैं.

शालू नामक युवती के लिए अदालत में हर पेशी के बाद लौटने पर बायकुला जेल के दरवाजे पर अपने चार साल की बच्ची को कपड़े उतारते देखना बेहद कष्टदायक था. वह कहती हैं, ‘मेरी बेटी को पता था कि उसकी तलाशी ली जाएगी. यह इतनी आम बात थी कि बच्चों को यह लगने लगा कि हर बार जेल से बाहर जाते और वापस भीतर आते वक्त कपड़े उतारने हाते हैं.’ ये बच्चे कैदी नहीं हैं, लेकिन अक्सर उनके साथ ऐसे व्यवहार किया जाता है कि वे भी कैदी ही हैं.

उपाध्याय वाले फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने जेल के बाहर स्वतंत्र तरीके से एक नर्सरी या क्रेच स्कूल खोले जाने का आदेश दिया था. 2006 के उपाध्याय वाले फैसले में कहा गया था, ‘महिला जेल के साथ एक क्रेच और एक नर्सरी की व्यवस्था होगी जिसमें महिला कैदियों के बच्चों का ध्यान रखा जाएगा. जेल अधिकारी जेल परिसर के बाहर इस क्रेच और नर्सरी का संचालन करेंगे. सिर्फ कुछ जेलों ने इसका पालन किया. कइयों ने आजतक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है.’

टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ में सेंटर फॉर क्रिमिनोलॉजी के प्रोफेसर और प्रयास के प्रोजेक्ट डायरेक्टर प्रोफेसर विजय राघवन बताते हैं, ‘महाराष्ट्र के अलावा किसी राज्य में महिला कैदियों के साथ रह रहे बच्चों की देखभाल करने वाली आंगनवाड़ी-  भारत सरकार द्वारा 1975 में इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवेलपमेंट सर्विस प्रोग्राम के तहत चाइल्ड केयर सेंटरों की प्रणाली- जैसी सामान्य चीज भी नहीं है. कुछ जगहों पर आप स्थानीय एनजीओ द्वारा स्थापित प्राइवेट सेंटर या क्रेच देख सकते हैं. लेकिन यह मुख्यतौर पर जेल अधीक्षक की दिलचस्पी पर निर्भर करता है. इस संबंध में कोई एक समान व्यवस्था नहीं है.’

प्रयास के साथ जुड़ी एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता सुरेखा साले ने बताया, ‘कोविड-19 महामारी के दौरान इन आंगनवाड़ियों को अचानक रोक दिया गया. पिछले महीने जाकर कहीं मुंबई और थाने सेंट्रल जेलों ने अपनी आंगनवाड़ियों को फिर से खोला है.

साले पिछले कुछ महीनों से राज्य के अधिकारियों को इन आंगनवाड़ियों को फिर से खोलने के लिए मनाने में लगी थीं. लगभग तीन दशकों तक जेलों में काम करने के अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने बताया कि ‘जेलें किसी की भी अपनी जगह नहीं हैं, और इनमें भी महिलाएं और उनके बच्चों की स्थिति सबसे खराब है.’

जेलों में बच्चों का जन्म

पुरुष कैदियों के विपरीत जेल की सजा पाने पर ज्यादातर महिला कैदी परिवार वालों द्वारा छोड़ दी जाती हैं और गर्भवती महिलाओं की स्थिति इनमें भी सबसे खराब होती है.

गिरफ्तारी के समय गर्भवती होने होने पर परिवार वालों द्वारा छोड़ दिए जाने और ज्यादा कठिनाइयों के डर से महिलाएं सामान्य तौर पर गर्भपात कराने का फैसला करती हैं. लेकिन गर्भपात कराना आसानी से उपलब्ध विकल्प नहीं है. एक बार जेल में आने के बाद वह अपनी शारीरिक स्वायत्तता गंवा देती है और सत्ता और न्यायपालिका का उस पर अधिकार हो जाता है.

2012 की शुरुआत में मनीषा नामक एक 32 वर्षीय महिला को धोखाधड़ी के मामले में गिरफ्तार किया गया था और बायकुला जेल भेजा गया था. वे निश्चिंत थीं कि उन्हें कुछ हफ्तों में जमानत पर छोड़ दिया जाएगा. उस समय मनीषा की गर्भावस्था का पहला महीना चल रहा था.

अंतर्मुखी स्वभाव वाली मनीषा ने अपनी गर्भावस्था के बारे में किसी को नहीं बताया, यहां तक कि अपनी कोठरी में साथ रहनेवालियों को भी नहीं. बायकुला जेल में मनीषा के साथ कई महीने बितानेवाली एक पूर्व कैदी ने बताया, ‘वह ढीले-ढाले कपड़े पहनती थी और खुद को शॉल से ढके रहती थी. हममें से कुछ ने उसकी चाल-ढाल में बदलाव देखा, लेकिन कभी उससे पूछ नहीं सके.’

मनीषा ने अपने वकील के जरिये जमानत की अर्जी दी. कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया. जैसा कि उसे डर था, उनके परिवार ने उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया. वह गर्भावस्था की तीसरी तिमाही तक जेल में रहीं. 2012 में बायकुला जेल में सेवारत एक जेलर ने बताया कि जेल में अपने आठ महीने के दौरान मनीषा जेल में कई शक्तिशाली पेन किलर और रेजर ब्लेड ले आने में सफल रही थीं.

उन्होंने बताया, ‘जब मनीषा को प्रसव पीड़ा हो रही थी, करीब रात के दो बजे वो धीरे से टॉयलेट गई और वहां खुद से शिशु को जन्म दिया. उस समय जगी हुई एक महिला ने मनीषा को टॉयलेट में देखा और लोगों को आगाह किया. जेल कर्मचारी जब तक उस जगह तक पहुंचते मनीषा ने तब तक बच्चे को एक बाल्टी में डुबा कर मार दिया था और बच्चे के शरीर को एक खाने के कूड़ेदान में फेंक दिया था.’

अवकाशप्राप्त आईपीएस अधिकारी डॉ मीरान चड्ढा बोरवनकर, जो उस समय राज्य की जेल प्रमुख थीं, ने जेल का दौरा किया था और इस मामले की जांच करने के लिए एक समिति का गठन किया था. एक दशक पुरानी घटना को याद करते हुए बोरवनकर ने कहा, ‘मनीषा जेल के अंदर की भीड़ के कारण अपनी प्रेगनेंसी को छिपा सकी. जेलों (बायकुला महिला जेल समेत) में जरूरत से ज्यादा भीड़ होने के कारण जेल अधिकारियों का ज्यादातार समय प्रशासन, कागज तैयार करने और अदालती कामों में बीत जाता है.’

मनीषा वाली घटना ने राज्य के जेल अधिकारियों को कई ठोस कदम उठाने के लिए विवश किया. ‘लापरवाही बरतने के लिए दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ तो कार्रवाई की ही गई, हमने कैदियों के भीतर से ही उनके बारे में जानकारी इकट्ठा करनेवाले तंत्र (बडी सिस्टम) को भी मजबूत किया, जिसके तहत कैदी अपने साथी कैदियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखते हैं.’

उन्होंने कहा कि इन उपायों के कारण जेलों में होने वाली आत्महत्या के मामलों से निपटने में भी काफी मदद मिली.

कुछ सालों के भीतर ही बॉम्बे हाईकोर्ट ने जेल अधिकारियों को निर्देश दिया कि अगर कोई महिला गर्भपात कराना चाहती है, वे कोर्ट के आदेश का इंतजार न करें.

जस्टिस वीके ताहिलरमानी और जस्टिस मृदुला भटकर ने 2016 में कहा, ‘अपने गर्भ को समाप्त करने का किसी महिला का फैसला कोई छोटी चीज नहीं है. कई बार गर्भपात महिलाओं के लिए एक बेहद कठिन हालात से निकलने का एकमात्र रास्ता होता है. कानून गर्भवती महिला को मातृत्व से इनकार करने का खास अधिकार देता है.’

लेकिन इस आदेश के बावजूद जेलों में गर्भवती महिलाओं की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है.  जैसवार ने बताया, ‘एक महिला के लिए (गर्भपात का) फैसला कर पाना एक तरह से नामुमकिन है. अब भी कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन किया जाता है, जिससे उसके लिए निर्धारित समय के भीतर गर्भपात कराना एक तरह से नामुमकिन हो जाता है.’

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

बच्चों के अपनी मांओं के साथ जेल से बाहर निकलने के बाद भी जेल की व्यवस्था का क्रूर प्रभाव उनके जीवन को बर्बाद करता रहता है. खासकर जेल में ही जन्मे बच्चों के लिए अपने ऊपर से जेल का ठप्पा हटाना लगभग नामुमकिन सा होता है.

2015 में मुस्कान कल्याण के आधारवाडी जेल में जन्मी थी. उसने करीब चार साल अपनी मां के साथ जेल में बिताए, जिन पर हत्या का आरोप था. अंततः ट्रायल कोर्ट ने उसकी मां को बरी कर दिया और मुस्कान और उसकी मां जेल से बाहर आ गए. लेकिन उसकी असली दिक्कतें तब शुरू हुईं, जब उसकी मां ने उसके जन्म प्रमाण पत्र को बदलने की कोशिश की.

उनकी मां ने बताया, ‘जन्म प्रमाणपत्र में उसके जन्म स्थान के तौर पर आधारवाडी दर्ज है.’ मुस्कान की मां ने बताया कि रिहाई के बाद से उसने लगभग सभी सरकारी दफ्तर में जन्म प्रमाणपत्र को बदलने के लिए अर्जी दी है. उनकी मां ने कहा, ‘अगर इसी प्रमाणपत्र के साथ उसे स्कूल में भर्ती करा दिया जाए, जिसमें उसके जन्मस्थान की जगह के सामने जेल लिखा गया है, तो यह उसके ऊपर न मिटने वाला ठप्पा हो जाएगा. मैं ऐसा होने नहीं दे सकती.’

साले ने बताया कि उपाध्याय वाले आदेश में कहा गया है कि मां के आवासीय पते को बच्चे के जन्म स्थान में जोड़ा जाना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता है.

अपनी मां के साथ मुस्कान. (फोटो: सुकन्या शांता)

साले और सामाजिक कार्यकर्ताओं की उनकी टीम जिद्दी सरकारी तंत्र से लड़ाई लड़ रही है और जिला प्रशासन से यह सुनिश्चित करने की अपील कर रही है कि बच्चों का सदा के लिए अपराधीकरण न किया जाए. इन प्रयासों से छोटे-छोटे बदलाव हुए हैं. उदाहरण के लिए थाने की चाइल्ड वेलफेयर कमेटी ने अपने क्षेत्राधिकार में आने वाले सभी अस्पतालों को जुलाई की शुरुआत में बच्चों के साथ हुए गलत को सुधारने का आदेश दिया. लेकिन जैसा कि साले का कहना है, इसके क्रियान्वयन में काफी लंबा समय लगेगा.

और जब तक ऐसा नहीं होता, मुस्कान जो अभी सात साल की है, स्कूल नहीं जा पाएगी.

(कैदियों और उनके बच्चों के नाम बदले गए हैं.)

(जाह्नवी सेन के इनपुट्स के साथ)

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

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