सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयुक्त अरुण गोयल की नियुक्ति में हुई ‘जल्दबाज़ी’ पर सवाल उठाए


सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम जैसी व्यवस्था बनाने का अनुरोध करने वाली याचिकाएं सुन रही है. कोर्ट ने हाल ही में हुई निवार्चन आयुक्त अरुण गोयल की नियुक्ति को लेकर कहा कि इसमें ‘बहुत तेज़ी’ दिखाई गई और उनकी फाइल 24 घंटे भी विभागों के पास नहीं रही.

चुनाव आयुक्त अरुण गोयल. (फोटो साभार: चुनाव

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को निर्वाचन आयुक्त के तौर पर अरुण गोयल की नियुक्ति में ‘जल्दबाजी’ पर सवाल उठाए.

वहीं, केंद्र ने न्यायालय की टिप्पणियों का विरोध किया और अटॉर्नी जनरल ने कहा कि गोयल की नियुक्ति से जुड़े पूरे मामले पर विस्तारपूर्वक गौर किया जाना चाहिए.

लगातार तीसरे दिन मामले की सुनवाई शुरू होने पर जस्टिस केएम जोसेफ की अगुवाई वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने निर्वाचन आयुक्त के तौर पर गोयल की नियुक्ति से जुड़ी मूल फाइल पर गौर किया और कहा, ‘यह किस तरह का मूल्यांकन है? हम अरुण गोयल की योग्यता पर नहीं बल्कि प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं.’

पीठ में जस्टिस अजय रस्तोगी, जस्टिस अनिरुद्ध बोस, जस्टिस हृषिकेश रॉय और जस्टिस सी टी रविकुमार भी शामिल थे.

कोर्ट ने एक दिन पहले केंद्र से अरुण गोयल की नियुक्ति को लेकर कई सवाल करते हुए अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से उनकी नियुक्ति से जुड़ी फाइल पेश करने को कहा था.

गुरुवार को पीठ ने सवाल किया कि गोयल की चुनाव आयुक्त के तौर पर नियुक्ति में ‘बहुत तेजी’ दिखाई गई और उनकी फाइल 24 घंटे भी विभागों के पास नहीं रही.

केंद्र ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी के जरिये इसका प्रतिवाद करते हुए पीठ से नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े पूरे मुद्दे पर विचार किए बगैर टिप्पणी न करने का अनुरोध किया. इस पर पीठ में शामिल जस्टिस अजय रस्तोगी ने वेंकटरमणी से कहा, ‘आपको अदालत को सावधानीपूर्वक सुनना होगा और सवालों का जवाब देना होगा. हम किसी उम्मीदवार पर नहीं बल्कि प्रक्रिया पर सवाल कर रहे हैं.’

लाइव लॉ के अनुसार, अटॉर्नी जनरल (एजी) द्वारा पेश की गई फाइलों के अवलोकन के बाद पीठ इस बात से हैरान थी कि एक दिन के भीतर नियुक्ति क्यों की गई. इसने अटॉर्नी जनरल से यह भी पूछा कि एक व्यक्ति, जिनका कार्यकाल अनिवार्य रूप से 6 वर्ष की अवधि का नहीं होगा, उन्हें नियुक्त क्यों किया गया.

पीठासीन जज जस्टिस केएम जोसेफ ने सवाल किया, ‘हमारे पास किसी व्यक्ति के खिलाफ कुछ भी नहीं है. असल में, यह व्यक्ति शैक्षणिक रूप से उत्कृष्ट है, लेकिन हम नियुक्ति के तरीके को लेकर चिंतित हैं. 18 तारीख को हम मामले की सुनवाई करते हैं, उसी दिन आप फाइल ट्रांसफरकर देते हैं. उसी दिन प्रधानमंत्री कहते हैं कि मैं उनके नाम की सिफारिश करता हूं. यह जल्दबाजी क्यों?’

उन्होंने आगे कहा, ‘… इसमें कहा गया है कि एक सूची के आधार पर आपने 4 नामों की सिफारिश की है. मैं वास्तव में समझना चाहता हूं कि नामों के विशाल भंडार में से आप कैसे एक नाम का चयन करते हैं … कोई ऐसा जो आने वाले दिसंबर में सेवानिवृत्त होने वाला था. वह उन 4 नामों, जिनकी सिफारिश की गई थी, में सबसे छोटा है. क्या यह कोई मानदंड है? आपने कैसे चयन किया?’

जस्टिस अजय रस्तोगी ने यह भी कहा कि कभी-कभी किसी न किसी वजह से नियुक्तियों में तेजी की जरूरत होती है. हालांकि उन्होंने बताया कि यह पद 15 मई से रिक्त था. उन्होंने सवाल किया, ‘क्या आप हमें दिखा सकते हैं कि 15 मई से 18 नवंबर तक आपने क्या किया? सरकार पर क्या दबाव था कि आपने एक दिन में यह सुपरफास्ट नियुक्ति की? उसी दिन प्रक्रिया शुरू हुई, उसी दिन क्लीयरेंस, उसी दिन आवेदन, उसी दिन नियुक्ति. फाइल 24 घंटे भी विभागों के पास नहीं रही. बिजली-सी तेजी दिखाई गई!’

हालांकि, एजी ने जवाब दिया कि सभी चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक त्वरित प्रक्रिया के माध्यम से की जाती है. उन्होंने दावा किया कि आमतौर पर प्रक्रिया 3 दिनों से अधिक नहीं चलती है. उन्होंने कहा, ‘एजी के रूप में मेरे परामर्श के कारण भी नियुक्ति की तेजी आई.’

पीठ ने सरकार से पूछा कि वह कौन सा मानदंड था जिसके आधार पर कानून मंत्री ने चार नामों को शॉर्टलिस्ट किया था, जिनकी सिफारिश प्रधानमंत्री से मंजूरी के लिए की गई थी.

इस पर एजी ने जवाब दिया कि शॉर्टलिस्टिंग के लिए कुछ निश्चित आधार हैं, जैसे कि वरिष्ठता, सेवानिवृत्ति, चुनाव आयोग में उनका कार्यकाल, ताकि जिसे नियुक्त किया गया है उसे चुनाव आयुक्त के रूप में कम से कम 6 साल का समय मिले.’

यहां जस्टिस जोसेफ ने इशारा किया कि जिन 4 नामों को शॉर्टलिस्ट किया गया था, उनमें से भी सरकार ने ऐसे लोगों के नाम चुने जिन्हें चुनाव आयुक्त के रूप में 6 साल भी नहीं मिलेंगे. उन्होंने कहा, ‘आपको उन लोगों को चुनने की जरूरत है जिन्हें ईसी के रूप में 6 साल मिलना चाहिए. अब आपने ऐसे लोगों को नहीं चुना है जिन्हें ईसी के रूप में 6 साल की सामान्य अवधि मिलेगी.’

उन्होंने जोड़ा कि यह मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1991 की धारा 6 का उल्लंघन है.

न्यायाधीश ने आगे कहा, ‘आपने कहा था कि जिस श्रेणी से हाल ही में अफसर नियुक्त किया गया है, उस श्रेणी में कोई अन्य अधिकारी नहीं हैं. हालांकि, एक ही कैडर से ऐसे कई नाम हैं. हम सूची पढ़ सकते हैं. हम जानना चाहते हैं कि आपका इस नाम तक कैसे पहुंचे… डेटाबेस में युवा लोग भी हैं. हम आपसे जानना चाहते हैं कि आपने इस आयु वर्ग के लोगों को फिल्टर करने के लिए क्या तंत्र अपनाया है, आदि.’

एजी ने जवाब दिया कि बैच एक मानदंड है, जन्म की तारीख मानदंड है और बैच की वरिष्ठता भी. इस पर जस्टिस जोसेफ ने कहा, ‘तो अंततः आप कह रहे हैं कि केवल उन लोगों को नियुक्त करने की जरूरत है जो रिटायर होने के कगार पर हैं, ताकि उन्हें पूरे 6 साल की अवधि न मिले. सावधानी से बोलिए. क्या यह कानून है? आप धारा 6 का उल्लंघन कर रहे हैं. हम यह स्पष्ट रूप से कह रहे हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘उस सेक्शन का महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि किसी को 6 साल की अवधि के लिए नियुक्त करने की आवश्यकता है. अब एक शर्त है जो कहती है कि अगर वह व्यक्ति उससे पहले 65 साल का हो जाता है तो उसे रिटायर होना होगा. आप शर्त का उपयोग कर रहे हैं. शर्त नियम बन गई है. क्या ऐसा हो सकता है?’

एजी ने जवाब दिया, ‘हां ऐसा होता है लेकिन इसके पीछे कोई साजिश नहीं है. जब तक मेरे पास यह दिखाने के लिए 40-50 साल का प्रोफाइल नहीं है कि यह कैसे और क्यों किया जाता है.’

इस पर जस्टिस जोसेफ ने कहा, ‘कानून कहता है कि कार्यकाल 6 साल होगा और आम तौर पर कानून का पालन करने की जरूरत होती है.

सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी कहा, ‘एक कानून मौजूद है. हम आपसे उम्मीद करते हैं कि आप इस तरह से कार्य करेंगे कि आप वैधानिक आवश्यकताओं का पालन करेंगे. ऐसा क्यों है कि आपके पास सेवानिवृत्त नौकरशाहों का ही एक ‘पूल’ होगा, अन्य का क्यों नहीं? केवल चार नाम क्यों? उम्मीदवारों का एक बड़ा पूल क्यों नहीं?’

जस्टिस जोसेफ ने कहा कि ‘क्या आप मेधावी युवा उम्मीदवारों को बाहर नहीं कर रहे हैं? ऐसा लगता है कि आप इस बात पर अड़े हुए हैं कि किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त को आयोग में पूरे छह साल का कार्यकाल न मिले और यह कानून के खिलाफ है.’

जस्टिस जोसेफ ने कहा कि मुद्दा यह है कि बड़ी संख्या में अधिकारियों के पूल से सरकार ने केवल उन लोगों को चुना है जो छह साल का कार्यकाल कभी पूरा नहीं करने वाले हैं. उन्होंने पूछा, ‘नाम प्रधानमंत्री को क्यों भेजे गए, मंत्रिपरिषद को क्यों नहीं?’

संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि कोई गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि अदालत सरकार के खिलाफ है और यह केवल इस मुद्दे पर बहस और चर्चा कर रही है. अटॉनी जनरल ने जवाब दिया, ‘जी, यह एक बहस है और मैं अदालत के सवालों का जवाब देने के लिए बाध्य हूं. अगर हम हर नियुक्ति पर संदेह करना शुरू करते हैं, तो संस्थान की प्रतिष्ठा पर भी विचार किया जाना चाहिए.’

वेंकटरमणी ने कहा कि मौजूदा प्रणाली काफी लंबे समय से काम कर रही है और यह परंपरा है जिसका पालन किया जा रहा है.

जस्टिस रॉय ने कहा कि शीर्ष अदालत कारण और तर्क तलाशने के लिए संघर्ष कर रही है कि कानून मंत्री द्वारा इन चार नामों का चयन कैसे किया गया.

सुनवाई के अंत में अदालत ने निर्वाचन आयुक्त और मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम जैसी व्यवस्था बनाने का अनुरोध करने वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया और संबधित पक्षों से पांच दिन में लिखित जवाब देने को कहा.

निवार्चन आयुक्त के रूप में अरुण गोयल की नियुक्ति कोर्ट की पड़ताल के दायरे में आ गई, जिसने इस सिलसिले में केंद्र से मूल रिकॉर्ड तलब करते हुए कहा था कि वह (शीर्ष न्यायालय) जानना चाहता है कि कहीं कुछ अनुचित तो नहीं किया गया है.

पंजाब कैडर के आईएएस अधिकारी गोयल को 19 नवंबर को निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किया गया. वह 60 वर्ष के होने पर 31 दिसंबर को सेवानिवृत्त होने वाले थे.

अपनी नई भूमिका संभालने के बाद गोयल मौजूदा सीईसी राजीव कुमार के फरवरी 2025 में सेवानिवृत्त होने के बाद अगले मुख्य निर्वाचन आयुक्त होंगे. मई में पूर्ववर्ती सीईसी सुशील चंद्रा के सेवानिवृत्त होने के बाद निर्वाचन आयोग में एक पद रिक्त हुआ था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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